सबस्टेशन में ट्रांसफार्मर को पैरलल में क्यों जोड़ते हैं?

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parallel operation of transformer in hindi

आज के इस पोस्ट में हम आपको ट्रांसफार्मर के पैरलल ऑपरेशन के बारे में बताएंगे। हम सबस्टेशन में ट्रांसफार्मर को पैरलल में क्यों जोड़ते हैं? आखिर ट्रांसफार्मर को पैरल में जोड़ने की क्या जरूरत पड़ती है?

मान लेते हैं हमारे पास 150-150 kVa के दो ट्रांसफार्मर है और उनको हमने पैनल में जोड़ा है। अब आपके मन मे सवाल आएगा के हम 150-150 kVa के दो ट्रांसफॉर्मर इस्तेमाल ना करके 300 kVa का एक ट्रांसफार्मर इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकते?
 

इन सबसे पहले आपको एक चीज समझने पड़ेगी वह है Electrical Power Demand या फिर Maximum Power Demand (MDA)

अब जैसे पूरे दिन की बात करें तो पूरे दिन में दिन और रात को मिलाकर 24 घंटे होते हैं।  लेकिन यहां पर हम उदहारण के लिए सुबह 6:00 बजे से लेकर रात की 12:00 बजे तक के समय को ही कैलकुलेट करते हैं।

पहले हम आपको एक ग्राफ दिखाते हैं।

parallel operation of transformer
parallel operation of transformer

ऊपर दिए इस ग्राफ में आप को दिखाया जा रहा है सुबह 6:00 से रात के 00:00 के बीच में जो लोड होता है वो दिखाया गया है।

जैसे कि

6 से 9 बजे तक – 80 kW
9 से 12 बजे तक – 100 kW
12 से 15 बजे तक – 95 kW
15 से 18 बजे तक – 105 kW
18 से 21 बजे तक – 120 kW
21 से 00 बजे तक – 90 kW

तो जैसा कि हम देख सकते हैं कि पूरा दिन एक जैसा लोड नही रहता, ये सुबह 6 बजे और रात के 12 बजे के आस पास काम रहता है और शाम के 6 बजे से 9 बजे के आस पास तक ज्यादा रहता है।

तो इसे आपको यह पता लगता है कि जो ट्रांसफार्मर पर लोड पड़ता है वह पूरा दिन एक जैसा नहीं रहता। वह कभी कम हो जाता है। कभी ज्यादा हो जाता है। तो इसी हालात में हम ट्रांसफार्मर के पैरलल ऑपरेशन को अपनाते हैं। ताकि हम टाइम के अनुसार इस लोड को एडजस्ट कर सकें।

जैसा कि पहले हमने बताया था कि हमारे पास 150-150 kVa के दो ट्रांसफार्मर हैं और इनको इस्तेमाल करना है, तो पहले ये देखना होगा कि एक ट्रांसफार्मर पे हम कितना लोड डाल सकते हैं इसके लिए हमें kW निकलना होगा, क्योंकि लोड हमारा kW में होगा या फिर MW में होगा और ट्रांसफॉर्मर की रेटिंग kVa में होती है तो इसके लिए हमें पहले kVa को kW में बदलना होगा। kW निकलने के लिए kVa को पावर फैक्टर से गुना करना होगा। मान लेते हैं हमारा पावर फैक्टर 0.9 है।

kVa to kW = 150×0.9 = 135

तो 150 को 0.8 से गुणा करते हैं तो 135 KW आ जाता है।

अब ऐसा करने से हमें पता लग गया कि हम इस 150 kVa के ट्रांसफार्मर के ऊपर 135 KW तक का लोड डाल सकते हैं। लेकिन यह 135 KW है वह हमारा 100℅ लोड है। अब हम 100℅ लोड किसी भी मशीन के ऊपर नहीं डालते हैं।

क्योंकि कोई भी मशीन हो उसको हम उसकी 100℅ एफिशिएंसी के साथ इस्तेमाल नहीं कर सकते। जितनी उसकी एफिशिएंसी होती है, हम उससे कम लोड ही उसके ऊपर डालते हैं। या फिर यूं कहें कि हम किसी भी मशीन की क्षमता का 100℅ इस्तेमाल नहीं करते हैं। हम उसपे सिर्फ 80% लोड ही डाल सकते हैं। तो अब हमें 135 का 80% निकालना होगा। उसको निकालने के लिए हमें 135×80/100 या फिर 135×0.8 करना होगा।

तो अब देखते हैं।

135×80/100 = 108

या फिर

135×0.8 = 108

तो अब हमें पता लग गया कि हम हमारे ट्रांसफार्मर पर टोटल 108 KW तक लोड डाल सकते हैं।

हम मान लेते हैं हमारा लोड सुबह के टाइम 80 KW चल रहा है जिस पर एक ट्रांसफार्मर काम कर जाएगा। उसके बाद देखते हैं हम दोपहर के 12:00 बजे तक के लोड पे भी एक ट्रांसफार्मर काम कर जाएगा।

लेकिन अब बात करें कि तो पीक हॉर्स में हमारा लोड कितना है तो जैसा कि हमने पहले में दिखाया था कि पीक हॉर्स में हमारा लोड 115 KW तक था तो वह 115 KW हम पूरा का पूरा एक ही ट्रांसफॉर्मर पे तो डाल नहीं सकते। तो ऐसी कंडीशन में हम ट्रांसफार्मर के पैरलल ऑपरेशन का इस्तेमाल करते हैं ताकि जितनी मैक्सिमम डिमांड या मैक्सिमम लोड जाता है, उसको दोनों ट्रांसफार्मर मिलकर झेल सके।

तो उम्मीद है अब आपको समझ में आ गया होगा कि हम ट्रांसफार्मर को पैरलाल में क्यों जोड़ते हैं।

अब बात करते हैं ट्रांसफार्मर को पैर लाल में चलाने के फायदे क्या क्या है?

जैसे कि हमने पहले ही बताया था हमारे 150-150 kVa के ट्रांसफार्मर है तो हम 300 kVa का एक ट्रांसफार्मर इस्तेमाल क्यों नही कर सकते है?

एक फायदा तो हमने यहां पर पहले आपको हम बता दिया है कि जब लोड घटता बढ़ता है उसको उसी हिसाब से एडजस्ट कर सकते हैं। लेकिन इसके और भी फायदे होते हैं।

मान लीजिये हमारे पास दो ट्रांसफार्मर लगे हुए हैं और किसी एक ट्रांसफार्मर में फॉल्ट आ जाता है तो वह तो ऑपरेशन से बाहर हो जाएगा तो ऐसे में हमें आगे पावर की सप्लाई भी करनी होती है तो उस हालात में एक ट्रांसफार्मर हमारा बंद पड़ा है तो हमारा दूसरा ट्रांसफार्मर है, वह हमारी पावर की डिमांड को पूरा करेगा।

और जब हमारा दूसरा ट्रांसफार्मर ठीक हो जाएगा तो हम फिर से इन दोनों को पैरलल ऑपरेशन में लेकर चलेंगे और दोनों के ऊपर लोड डाल देंगे, लेकिन जब तक पहला ट्रांसफार्मर ठीक नहीं होता है, हम दूसरे ट्रांसफार्मर के सहारे ही पावर की सप्लाई करते रहेंगे। जिससे उपभोक्ता को कोई भी परेशानी नहीं आएगी।

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साथ ही अगर हम ट्रांसफॉर्मर का पैरलल ऑपरेशन करते हैं तो ट्रांसफार्मर की एफिशिएंसी भी बढ़ जाती है क्योंकि जो पूरा का पूरा लोड है वह सिंगल ट्रांसफार्मर पर नहीं आता, क्योंकि जब भी ज्यादा लोड हो जाता है तो दोनों ट्रांसफार्मर ऑपरेशन में आ जाते हैं और पूरे लोड को आपस मे शेयर कर लेते हैं जिससे दोनों ट्रांसफार्मर के ऊपर ज्यादा लोड नही पड़ता और अगर ज्यादा लोड नहीं पड़ेगा तो ट्रांसफार्मर की लाइफ भी अच्छी होगी और उसकी एफिशिएंसी भी सही बनी रहेगी।

क्योंकि अगर आप एक ही ट्रांसफार्मर पर पूरा लोड चलाते रहोगे तो उसपर लगातार लोड चलने के बाद थोड़े से दिन में उसमें कोई ना कोई दिक्कत आनी शुरू हो जाएगी और उसकी लाइफ भी ज्यादा नहीं रहेगी।

अब बात करते हैं ट्रांसफार्मर को पैरलल में लगाने की कंडीशन कौन-कौन सी होती हैं?

बात करें सिंगल फेस और 3 फेस की तो दोनों ट्रांसफार्मर में यह कंडीशन अलग-अलग होती हैं। सिंगल फेस में हमें थोड़ी सी कम कंडीशन फॉलो करने पड़ते हैं और 3 फेस में कुछ ज्यादा कंडीशन होते हैं जो ट्रांसफार्मर के पैरलल ऑपरेशन के लिए फॉलो करने पड़ते हैं।

अगर आप का ट्रांसफार्मर सिंगल फेस है तो यहां पर निम्नलिखित कंडीशन आपको फॉलो करनी होंगी।

  1. दोनों ट्रांसफार्मर की वोल्टेज बराबर होनी चाहिए।
  2. दोनों ट्रांसफार्मर की फ्रीक्वेंसी बराबर होनी चाहिए।
  3. ट्रांसफॉर्मर का अनुपात (Ratio) भी एक जैसा होना चाहिए।
  4. इंपिडेन्स वोल्टेज भी सेम होनी चाहिए।

अब बात करते हैं 3 फेस के ट्रांसफार्मर की कंडीशन के बारे में

  1. सिंगल फेस वाली सभी कंडिशन 3 फेस मे भी लागू होंगी।
  2. फेस डिफरेंस सेम होना चाहिए।
  3. पोलैरिटी भी सेम होनी चाहिए।
  4. फेस रोटेशन भी सेम ही होना चाहिए।

फेस डिफरेंस आपने पढ़ा होगा कि सभी फेस में 120 डिग्री का एंगल होता है तो वह सब में सेम होना चाहिए।

पोलैरिटी जैसे RYB है तो R के साथ R, Y के साथ Y और B के साथ B ही जुड़ना चाहिए।

अब लास्ट में एक बार फिर आपको पैरलल ऑपरेशन के फायदे बता देते हैं।

अगर पैरलल आपरेशन में किसी भी ट्रांसफार्मर में कोई भी फॉल्ट आ जाता है तो हम एक ट्रांसफार्मर को पूरी तरह शट डाउन करके उसके फॉल्ट को रेक्टिफाई कर सकते हैं।

पीक हॉर्स में हम दोनों ट्रांसफार्मर के ऊपर लोड शेयर कर सकते हैं।

इससे ट्रांसफार्मर की एफिशिएंसी भी बढ़ती है।

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